Light House

By | September 25, 2021

        उस रात लेहरों की रफ़्तार काफी तेज़ थी। उन लहरों की उंचाईयां कुछ और ही रुख बयान कर रही थी। भारी भरकम लहरें जब समंदर पार कर किनारो के पत्थरों से ‘धडाम$$…’ सी आवाज़ कर टकराती तो उसकी बड़ी छीटों की छलाँगे काफी दूर तक जा गिरतीं। वो रात लेहरों की रफ़्तार काफी तेज़ थी। हां… इतनी तो थी की एक आदमी जो जानकार तेहराक हो, वो भी समन्दर के बहकावे में बह जाए। पर कश्तियाँ मेहफ़ूज़ थी। वो दो कश्तियाँ भी जो समन्दर में अपना दिन भर का काम ख़त्म कर वापिस किनारे लौट रही थी।

   वो दोनों कश्तियाँ किनारे की तरफ आ तो रही थी पर एक कश्ती गाँव के बन्दरगा की तरफ मुड रही थी तो दूसरी किसी अलग ही समद जा रही थी।

Light House

“फिर से लाइटहाउस की और जा रहे हो?”

गांव की और मोड़ खाती कश्ती पर सवार मल्लाह ने दूसरी कश्तीवाले को आवाज़ देते हुए पूछा।

  उस कश्ती पर सवार भैरो ने जवाब में सिर्फ अपना हाथ ऊपर किया और फिर से चप्पू पर अपनी पकड़ मजबूत कर और उसे रफ़्तार देते हुए उसने लाइट हाउस की और कश्ती मोड़ दि।

“गंजेड़ी सला…”

गाँव की और मुड़ते उस कश्ती से मल्लाह ने भैरो को चिढाने की सुरत में जोर से कहाँ। लेकिन भैरो सुनाता कहा, वो तो अपने धुन में मस्त अपनी चप्पू की रफ़्तार बढ़ाये लाइटहाउस की और अपनी कश्ती मोड़ चुका था।

   रात के उस काले समन्दर को पर कर भैरो जैसे ही लाईटहाउस की और पहुचने लगा उसने अपनी रफ़्तार धीमी कर दी और वो एक नजर उस नायाब नज़ारे को देखता रहा।

   पत्थरो की थोड़ी ऊंची चढ़ाई पर बना वो एक आसमान से बातें करती ऊँची लाइटहाउस की इमारत थी। सूरत ए शकल में तो वह इमारत काफी पुरानी नजर आ रही थी। पर बुजुर्ग साबित होते हुए भी वो कई सालों से अपने आप को डटाये खड़ी थी….समंदर के उन पत्थरों की तरह।

   लाईटहाउस के ऊपर चारो और घुमती उस बत्ती की रौशनी जैसे ही भैरो की आँखों पर पड़ी तो उसकी आँखों में  वो चमक साफ दिखाई दे रही थी और उसका चेहरा भी। हररोज समंदर की आगोश में रहकर वो भी उसके जैसे ही हो गया था। उसकी चेहरे पर समंदर की लेहरो जैसी काफी सिलवटे थी, जो उसकी बढती उम्र बयान कर रही थी, लेकिन उसी समंदर की तरह वो अंदर से काफी शांत था। उसने खाकी रंग की कमीज पहन रखी थी जिसके ऊपरी दो बटन खुले हुए थे, नीचे घुटनो तक आती नीली चौकडी वाली लुंगी पहनी हुयी थी और गले में लाल गमछा टंगा हुआ था। उसके गले में जहाज के लंगर जैसा दिखता एक ताबीज़ भी लटक रहा था और धीमी चलती उस कश्ती में चप्पु से अपने हाथ हलके करते हुए वो लाईटहाउस के उस नायब नज़ारे को देख रहा था।

     पत्थरों से बने एक ऊँची चढाई वाले चट्टान के पास आकर भैरो की कश्ती रुक गायी। ‘भैरों सिंह की कश्ती’ ऐसा बड़े लफ़्ज़ों में कश्ती पे लिखा वो नाम उस चाँद रात में काफी साफ दिखाई दे रहा था। भैरो कश्ती से उतर गया। दो पत्थरो के बीच गड़ी हुयी एक खुटी थी। उसी खुटी से उसने अपने कश्ती को बांध दिया। इतने अँधेरे में भी उसे वो खुटी नजर पड़ी मतलब वो अक्सर अपनी कश्ती यही बाँधता था। शायद वो पत्थरों के बिच वो खुटी भी उसने ही गाड़ी हुई थी। पत्थरों का सहारा लेकर और अपनी गीली चप्पल से ‘चप$$.. चपाक$$..’ सी आवाज़ करते हुए वो उस छोटी चट्टान की चढाई कर ऊपर पहुँच गया।

     भैरो अब लाईटहाउस के ठीक सामने खड़ा था। कमर पे हाथ रखकर उस ऊँचे मीनार से लाईटहाउस को देखते हुए उसने अपनी छोटी चढाई की और दिन भर की थकान की  राहत में एक गहरी सांस ली और छोडी। वहां उसे काफी शांती और सुकूनभरा महसूस हुआ। वहां हवा काफी तेज़ चल रही थी, तेज़ हवा के कारण उसके जिस्म पर टंगे कपडे भी फड़फड़ा रहे थे और वो अपने हाथ से अपनी लुंगी संभाले खड़ा था।

     भैरो ने जब अपना मुँह फेरा तो उसे पता चला की शांती और सुकून भरे उस माहौल में वो अकेला शख्स मौजूद नहीं था। लाईटहाउस के पास ही एक बड़े से पत्थर पे एक आदमी बैठा अपना सर निचे झुकायें, दोनों हाथ पत्थर पर रखे मायूस बैठा हुआ था। पता नहीं अपने कौन से गम का मातम मना रहा था? अपने गम में डुबे कई गम मशगुल अपने गम को भुलाने ऐसे ही किसी सन्नाटे भरी जगह अपने गम का शोर कम करने आते है। भैरो ने उसे सर से पाँव तक गौर से देखा, उस आदमी की निगाहें अभी भी नीचे थी। शायद अपने गम में मशगुल उसे वहां भैरो सिंह की मौजूदकी का एहसास भी नहीं था।

    भैरो ने उस शख्स को नजरअंदाज करते अपने कदम बढाए। और उसी शख्स से थोड़ा दूर एक बैठने लायक पत्थर देख वो अपनी तशरीफ़ टीका बैठ गया। उसने तशरीफ़ रखते ही अपने हाथ ऊपर कर अपने कंधे पीछे खिसकाते हुए और छाती बाहर निकाले एक अंगडाई ली और एक लम्बी उवासी भरी, दिन भर की थकान को राहत देते हुये। अभी उसे काफी बेहतर महसूस हो रहा था। फिर उसने अपनी बायीं जेब में हाथ डाला और एक छोटी कपडे की सफेद थैली बाहर निकाली। उस थैली में से उसने एक चिल्लम बाहर निकाली और एक माचिस भी।

  उसने चिल्लम और माचिस को नीचे रखते हुए फिर एक बार उस शख्स की और देखा लेकिन वो उसी मायूसी भरे हालात में बैठा हुआ था। भैरो ने उसे फिर नजरअंदाज कर अपने चिल्लम के नीचले हिस्से को हल्के हाथों से पत्थर पे ठोक लगाया, और फिर उसे अपनी मुठ्ठी में भर लिया। फिर उसने माचिस जलाई और एक ही बार में हल्का सा कश लिए चिल्लम जला दी। इतनी तेज़ हवा में एक ही बार में माचिस और चिल्लम जलाने की उसकी काबिलीयत वाकई में तारीफ़ के क़ाबिल थी। अब उसने चिल्लम पर अपनी मुठ्ठी की पक्कड़ और मजबूत कर दी, फिर वो दूसरे हाथ से चिल्लम को अपने मुँह के पास ले गया। अपनी आँखें बंद कर उसने एक और जोर भरा कश लिया। उसके अंदर एक नयी ताज़गी भरा एहसास जाग उठा जो धीरे धीरे उसके शरीर को तो हल्का कर रहा था लेकिन दिमाग को काफी भरी महसूस साबित कर रहा था।

  वो एहसास उसके जिस्म की सारी थकान को धुआँ कर उसके नाक और मुँह से बाहर निकला और हवा में शामिल हो गया। भैरो की चारों ओर उस धुएं के बादल बन गये।

   भैरों ने उस गरम एहसास का पूरा लुफ्त उठाये धीरे धीरे अपनी आँखें खोली। वो काबिल-ए-जन्नत का एहसास उसे पल भर में खुशनुमा कर गया था। उसकी आँखें भी भारी होने लगी थी। उन्हीं भारी आँखों से उसने फिर एक बार उस शख्स को देखा, लेकिन उसके सूरत-ए-हाल वही थे जो पहले थे, वो अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ था।

“ओ…।।”

    भैरो ने टाली बजा कर उस आदमी को पुकार लगाई और अपनी हाथ में रखी उस चिल्लम को ऊपर कर एक आध कश नोश फ़रमाने का नियोता दिया। पर वो ज़िद्द मिज़ाज़ कहा माना, उसने अपनी नीचे झुकायी मुंडी भी ऊपर न उठायी। शायद वो अपने अंदर पहले से ही कई कश दाग कर बैठा था। भैरो ने उसे फिर नजरअंदाज कर दिया।

     भैरो ने चिलम उठाई और फिर अपने मुँह से लगायी और एक और जोर भरा कश लिया और उसे धुआं कर छोड़ दिया। उस धुए को हवा होते देख वो कुछ देर तक वैसे ही ठहरा रहा। फिर जिस पत्थर पर वो बैठा था उसी का सहारा लिए वो खड़ा हुआ। उसने अपने हाथ ऊपर कर एक और उवासी ली और वो पीछे झाड़ियों की और जाने लगा। उस लाइट हाउस के पीछे झाड़ियों से भरा एक छोटा सा जंगल था और उसके पीछे एक और गाँव था। शायद वो शख्स जो मायूसी हालात मैं बैठा था वो उसी गाँव से आया हो। भैरो नशे में डोलते हुए उन जडियो के पास आकर रुक गया। अपने गले में टंगा गमछा उसने हवा में लहराया और हवा का रुख देखा। फिर एक सही समद चय वो खड़ा रहा और अपनी लुंगी उठाये पेशाब करने लगा। पेशाब करते करते वो यूं ही कोई धुन भी गुनगुना रहा था। तभी उसकी नजर लाईटहाउस की तरफ गयी। उस तेज़  हवा में एक कागज़ का टुकड़ा लहराते हुए जमीन की मंजील तय कर रहा था। हवा में लहराता वो कागज़ का टुकड़ा किसी चलानी नोट सा साबित हो रहा था। भैरो ने जल्दी से पेशाब ख़त्म कर अपनी ऊपर उठायी लुंगी नीचे की और उसी तरफ दौड़ पड़ा जहाँ वो कागज़ का टुकड़ा जमीन हुआ था।

    भैरो वहाँ पहुँचा और थोड़ा झुक कर उसने उस कागज़ के टुकड़े को बड़ी गौर निहारा। भैरो का शक सही था। वो एक बड़ा किमती चलानी नोट था। उसे देख भैरो की आँखें चौड़ा गयी। उसकी उन चौड़ी आँखों में लालच साफ दिखाई दे रहा था। उसने अपनी नजर चारो और घुमाई, उस पत्थर पर बैठे शख्स को भी देखा। वो अभी भी अपना सर निचे झुकाये मायूस बैठा हुआ था। फिर उसने झट से वो नोट उठायी, वो काफी चिप-चिपाई सी लग रही थी। उसने वैसे ही वो नोट अपने जेब में डाल ली। उसने फिर नजर उठाये हवा में देखा, वैसी और दो नोट हवा में लहराती नीचे आ रही थी। जब वो नोटें लहराती भैरो की पहुच तक आयी तो भैरोने जोर से छलांग लगा के उनको लपक लिया, वो भी वैसे ही चिप-चिपाई थी, भैरो ने उन्हें भी जेब में भर लिया। उसने फिर आस लगाये ऊपर देखा तो एक और नोट, उसके पीछे एक और और उसके पीछे एक और नोट उसको हवा में लहराती नजर आयी, मानो जैसे कुदरत ही उसपर मेहेरबानी की बारिश कर रही हो। भैरो ने नोट आती रुख की तरफ ध्यान से देखा तो पता चला की वो लाईटहाउस की खिड़की से बहार आ रही थी। भैरो की आँखें और चौड़ी हो गायी। उन बरसात होती नोटों का खजाना उसे मिल गया था। वो लाईटहाउस की और दौडा। लाईटहाउस के ऊपर चढाई करती सीढियो तक वो पहुचा। सीढियो के बाजु में लगे कठहरे का सहारा लिए वो सीढ़ी चढने लगा। सीढियो पर भी उसे कई नोट बिखरी पड़ी मिली, और हर मंजिल वो नोट समेटते आगे बढ़ता गया। और ऐसे ही वो आखिर आखिरी मंजिल पहुच गया।

   वहाँ एक दरवाजा था, वो शायद उस इमारत के लाईट रूम का कमरा था। तेज़ हवा की वजह से वो दरवाजा खुला-बंद हो रहा था। भैरो ने हांफते हुए अपने कदम आगे बढाए। और हवा से बंद होते दरवाजे पर अपना हाथ दबाकर उसे खोला। एक ‘कर्रर्रररर$$…’ सी आवाज करते दरवाजा खुला। और सामने जो खौफनाक मंजर था उसे देख भैरो चौक गया।

      एक औरत का मुर्दा जिस्म बिना कपड़ो के ज़मीन पर पड़ा हुआ था। और उसके जिस्म पर नोटों का ढेर लगा हुआ था। शायद कोई उसके नंगे जिस्म की और हवास में निगली उसकी जान की काफी बड़ी किमत लगा गया था। वो नंगा पड़ा जिस्म फिलहाल तो उस नोटों की चद्दर से ढका हुआ था, लेकिन तेज़ चलती हवाओं से धीरे धीरे वो चद्दर हट रही थी। उसके जिस्म पर गड़े गहरे घाव अभी साफ दिखाई दे रहे थे। उसके बदन पर वो नोचने के निशान उसके साथ घटी हैवानियत बयान कर रहे थे। उसके गले पर किसीके मजबूत पँजों की पकड के सख्त निशान थे। उसका चेहरा सफेद पड़ा हुआ था और आँखें जिसमे किनारो तक पानी समेटे हुआ था वो खुली थी जिन्होंने अपनी दर्दनाक मौत का वो आखिरी वाक़िया देखा था। उसके जिस्म का हर एक जख्म उस लाईट रूम में घटे उस घिनोने वाक़िये की गावही दे रहा था। उस लाईट रूम में हैवानियत भर, घिनोने हवास की बू आ रही थी। जमीन पर पड़े वो नंगे और ठन्डे पड़े जिस्म को देख भैरो को उलटी सी हुयी। उसने उल्टी रोकने के लिए फटाक से अपना डायना हाथ अपने मुँह पर रख दिया। भैरो ने अपने जेब से वो सारी नोट निकाली जो उसने समेटी थी और फिरसे उस जिस्म पर बिछा दी। दरवाजे पे पड़े उस हवा से उड़े नोटों की पसारे से उसने और नोट उठाई और उसका वो खुला पड़ा बदन फिर से ढक दिया। उस मरे पड़े मुर्दे जिस्म पर फिरसे वो नोटों का ढेर बन गया।

     खुदको संभालते हुए और मुँह पे हाथ राख अपनी उलटी दबाते हुए भैरो जल्दबाज़ी में सीढ़ियाँ उतर के निचे लाईट हाउस के नीचे पहुँचा। नीचे उतरते ही जब भैरो ने  अपने मुँह से हाथ निकाला तो उसकी सारी दबी हुयी उलटी जमीन पर गिरी। खाँसते खर्राते और हांफते हुए भैरो अपनी घुटनों पर हाथ रख कर झुके हुए खड़ा था। वह माहौल मैं बरक़रार वो सन्नाटा वही सूरत ए शकल रखे हुए था, और दिल दहला देने वाले उस खौफनाक मंजर ने भी भैरो को उसी सन्नाटे की तरह काफी खामोश कर दिया था।

     भैरोने फिर पत्थर पर बैठे उस आदमी को देखा वो अभी भी उसी सूरत ए हाल में बैठा हुआ था.. मायूस। भैरो उसके पास गया। जिस पत्थर पर वो आदमी बैठा था वहीँ जाकर उसके बगल में भैरो बैठ गया। बिलकुल उसी गुमनाम शख्स की तरह भैरोने अपने दोनों हाथ उस पत्थर पे रखे हुए थे और वो अपना सर झुकाये वही मायूस बैठा हुआँ था।