JINDGI

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जिंदगी किसी के लिए एक किताब हैं हमें उसे पढ़ना ही पड़ता हैं, जिंदगी किसी के लिए एक सफ़र है उसे बिताना ही पड़ता हैं, जिंदगी एक बाग हैं उसमें कांटे भी हैं और कहीं जंगली घास भी तो कहीं जिंदगी को महकाते गुलाब भी हैं। आप की जिंदगी आपके लिए चाहें कुछ भी हो उसका लुत्फ उठाएं । ये बस एक इम्तिहान हैं इसको ज्यादा गंभीरता से ना लें इससे सभी को गुजरना हैं।

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ये एक खेल हैं जहां ना कोई हारता न जीतता हैं , ये पॉडकास्ट सुनते सुनते उसका ध्यान खिड़की से बाहर हो रही बारिश पर गया जो हल्की थीं तो बहुत खुबसूरत थीं और जब तेज़ हो गयी तो तूफ़ान के जैसे सबकुछ बहां ले गई ।उसे इसमें अपनी जिन्दगी नज़र आ रही थीं बचपन उस हल्की बारिश की तरह था खुबसूरत और उम्र के साथ ये खुबसूरती एक तूफ़ान का रूप लेती गई और अपने साथ सब कुछ बहाँ ले गई और हाथ की लकीरें ख़ाली रह गई ।
ये वो बारिश थी जब बचपन में आती थी तो कागज़ की नाव बनाकर बहाया करते थे , भीगा करते थे , अब उम्र के इस मोड़ पर फुरसत तो बहुत हैं बस भीगने का दिल नहीं चाहता इन्हीं ख्यालों में उलझे उसे मां का कॉल आया देखा मगर उढ़ाया नहीं दूरियां जो थी उनके रिश्ते में बहुत सी शिकायते थी पर अब उनको करने का कोई मतलब नहीं रह गया था । बहुत देर हो चुकी थी मां से प्यार तो नहीं था पर अपनी मां को वो जिम्मदारी जरूर समझता था इसलिए हर महीने पैसे भेज दिया करता था । अब वो उनसे बहुत दूर था , घर से भी, मन से भी और जिंदगी से भी । रास्तों की दूरियां दिल पर बन चुकी थी ।
बेटे ने तो फ़ोन नहीं उढ़ाया आँखे गीली हो गई 7 साल हो चुके थे बेटे की आवाज़ सुने 21 साल की उम्र में गया था । शायद शादी भी करली हों या किसी से बात चल रही हों।
या फिर शायद आज भी अकेला हों अपनी पूरी जिंदगी की तरह । वो चिंता में पास रखी कुर्सी पर बैठ गई और अपने बगीचे के फूलों के और देखती हुईं बोलीं मैं भी तो ऐसी ही थीं, एक गांव में हरे भरे खेतों में पायल की छन छन करती दुपट्टा लहराती बारिश के मजे लेती , उसकी ताल से ताल मिलाकर नाचती , फूलों सी महकती और भंवरे मुझसे खेलते।
बस अपनी जिंदगी के कुछ पल याद करती हुईं फूट फूट कर रोने लगी।

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14 साल की थी वो जब उसकी शादी हुई थी घर में काफी खुशी थी लड़का भी 19 साल का होगा।
करता क्या है, कितना पढ़ा लिखा है ये सब कहां देखा गया बस पिता जी के दोस्त का बेटा था तो शादी हों गई ।
2 साल में भगवान ने 2 बच्चे भी दे दिए सेहत काफ़ी खराब हो गई । पहला बच्चा तो 7 माह में ही पैदा हो गया था, उसके बाद टीबी की बिमारी और गांव से शहर में इलाज़ के लिए आना और वो पति जो उसे बहुत प्यार करता था उसका हमेशा साथ देता था , जिसे वो बहुत प्यार करती थी उसका धीरे धीरे नशे का आदि हों जाना ।

ये नशा बुरी बला हैं परिवार बिखर जाता हैं, घर बिक जाता यहां तक अपनी सबसे अनमोल धरोहर अपनी पत्नी को भी लोग दाव पर लगा देते है ऐसा ही तो हुआ था न महाभारत में भी, 17 साल की उम्र में इतना कुछ झेला था और ऊपर से लोगों की ऐसी बातें मन हमेशा उलझन में रहता था।

दिन रात उसका नशे में आना , बढ़ते हुऐ खर्चे दो बच्चो की जिम्मेदारी ऊपर से ये बीमारी रात दिन झगड़े होते बच्चे रोते रहते वो मोहौल वो खुशी बच्चो को मिल ही नहीं पा रही थीं जिसके वो हकदार थे , और उसे भी कहां मिली थी वो खुशी हां बस शादी के बाद चार दिन की चांदनी थी जिंदगी में और फिर एक रात ने घर कर लिया ।
कितनी बार सोचा उसे छोड़ दूं पर हिम्मत नहीं थीं प्यार जो था उससे ।
सामने सामाज खड़ा था अकेली औरत को जीने कहां देता है,
और कंधों पर दो बच्चो की जिम्मदारी अकेले चलती भी तो कहां तक चलती कहां जाए किससे मदद मांगे ।
क्या कुछ नही क्या उसने अपने पति के लिए जो उसने चाहा उसकी जरूरतें पूरी करने के लिए कपड़े तक बिक गए उसके वो उसे छोड़ना नहीं चाहती थी बस वो पहले जैसा हों जाए , हो जाएगा हों जाएगा कहकर मन को झूठा दिलासा देती ।

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परेशान हों चुकी थीं वो इस जिंदगी से मरने को चलती तो बच्चो का चहरा सामने आ जाता कोई दूसरे की छोड़ी रोटी नहीं खाता भले ही बच्चे भगवान की देन हो पर मेरे जने बच्चे कौन संभालेगा।
फांसी के फंदे के अंदर ये सारे सवाल ये चेहरे नजर आ रहे थे ।
उसने फैसला किया अब चाहें कुछ भी हो जाए वो इस हाल में नहीं रहेगी अपने दोनों बच्चों को लेकर वो मां के घर चली गई पिता जी तो मर ही चुके थे ।
सबने वापस जानें के लिए बहुत समझाया पर जिस पर गुजरे वो जानें अपने फैसले पर वो अटल रही , पूरी पंचायत पूरे गांव से लड़ी ।
आख़िर में मां की तरफ से दबाव आया दूसरी शादी कर लो पर बच्चे छोड़ने होगें ।
मां खाना छोड़ सकती हैं पर बच्चे नहीं मां के आगे उसकी चल भी नहीं सकती थी दुनिया से लड़ सकती थीं पर मां से नहीं उसने उसके साथ वापस रहने का फैसला किया सामान उठा कर बच्चो के साथ वापस शहर की ओर रुख कर लिया ।

खिड़की से बाहर देखा ये वही खेत थे जिनके साथ वो खुद भी लहराती थी मगर अब उसे इस दुनियां के सारे रंग फीके लगने लगे थे ।
बड़ा बेटा 3 साल का हों गया था सब कुछ नहीं मगर बहुत कुछ समझता था , लेकिन उसे भी तो बाप का प्यार चाहिए था इसलिए वो वापस घर जाने की बात पर बहुत खुश था ।

अपनी मां के रोते हुए चेहरे को वो खुश देखना चाहता था , उसे लगता था कि ये खुशी उसे पिता जी के साथ रहने पर मिल जाएगी वो अपने मां बाप को साथ देखना चाहता था ।
वो वापस आ गई उसे देखते ही नसेड़ी ने उसे गले लगा लिया उसे उसमें से सिर्फ़ बदबू आ रहीं थीं यहां तक उसे सिर्फ़ उसकी मजबूरियां वापस ले आई थी फिर भी वो मुस्कुरा दी उसे वो एक मौका और देने के लिए तैयार थी ।

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कुछ दिन सब कुछ ठीक रहा पर फिर वो एक दिन शराब पी कर आया जैसे वसंत के बाद तूफ़ान आया , वो अकेला नहीं आया था आज उसके साथ कोई और भी था वहीं हुआ जिसका उसे डर था उसने दरवाज़ा बंद कर दिया वो सारी रात चिल्लाता रहा बच्चे सामने रो रहे थे उन्हें समझ ही नही आ रहा था की ये क्या हों रहा हैं मां डरी हुई थी भगवान को याद कर रही दोनों बच्चों को गले लगा लिया और वो 4 साल का राज़ गीली आंखों से मन ही मन कुछ समझने की कोशिश कर रहा था भले ही उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था पर फिर भी वो कोशिश कर रहा था ।

वो रात बहुत लंबी थीं जैसे कयामत गुजरी हों उस रात पूरी रात दरवाज़े पर गुजर गईं सुबह दरवाजा खोला तो दोनों नसेड़ी सामने पड़े थे ।
आते जाते लोगों के पैरों में वहीं दूर खड़े वो तीनों उन्हें देख रहे थे छोटा बेटा भाग कर बाप के पास गया और पूछा आपको क्या हों गया पापा उसने कहा कुछ नहीं बस एक सुकून की नींद लें कर उठा हूं ।
वो एक दम से आई और उसका हाथ पकड़ कर खींच लिया और खड़ी हो गई दोनों बच्चों को अपने आंचल मे समेट लिया छोटे शिवम के मन में तो ये बात घर कर गई सुकून …. नींद , और राज़ अपने बाप को नफ़रत से देख रहा था और वो बस अपने बच्चो को उस नसेड़ी के साए से बचाना चाहती थी।

Author: Chhavi

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