Jindgi ( part 2)

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वो सुबह उसमे जोश भर गई कल की रात जिंदगी की सबसे डरावनी रात थीं ।
हम अपने डर, दुख , दर्द को अपने ऊपर हावी भी होने दे सकते हैं और चाहें उस पर काबू कर उसे अपनी ताकत बना सकते हैं।
उसने पिछली रात जो कुछ झेला , महसूस किया वो ये सब जिंदगी में दोबारा कभी नहीं देखना चाहती थीं ।

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उसने अपने डर को अपनी मजबूरियों को अपनी ताकत बना लिया । वो अपने बच्चो को लेकर अंदर चली गई उसने तय कर लिया कि वो इस आदमी की जिंदगी में शक्ल नहीं देखेगी
उसने अपने चार कपड़े बांधे ज़ेवर क्या लेती सब कुछ तो बिक ही गया था चार पैसे वही लेकर बस बहन के घर आ गई दो बहनें थीं वो बस कोई भाई नहीं था और दुनिया में सिर्फ़ मां बची थी ।

मां का घर वो पहले ही देख चुकी थीं अब बहन के घर अपने स्वाभिमान को छोड़ कर आई थीं ।
लोग क्या कहेंगे , अपना घर छोड़ कर बहन के घर आ बैठी , अपना परछावा बहन के ऊपर डालेगी अपना घर तो तोड़ रही हैं इसका भी तुड़वाएगी , दो बच्चो का बोझ kon संभालेगा भला ये यहां आई है इसका पति भी बार बार यहां आएगा तुम्हारे भी दो बच्चे है उन पर क्या असर पड़ेगा ।

वो आई बाद में थीं लोगों की ज़बान पहले चलने लगीं और उनमें से बहुत सी बातें सच हो गईं ।
वो भी आया घर पर बुरा असर पड़ा 14 दिन ही बीते थे जीजा की गलत नज़र जो वो भाप रही थीं वो भी सच होने लगीं ।

वैसे भी एक पेड़ से झड़े पत्तो को लोग पैरों से रौंद कर ही चले जाते हैं उनकी कोई हैसियत नहीं होती ऐसी ही एक औरत की जिंदगी होती घर से बाहर एक औरत खुली तिजौरी की तरह होती हैं पर अपने घर में वो कौन सा वो महवूज थी वहां भी तो जिंदगी ने इसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया था।
ये जगह भी अब उसके रहने लायक नहीं बची थीं दो ही रास्ते थें या तो वो उसकी बात मानले या उसका घर छोड़ कर चली जाए ।
उसने दूसरे को ही चुना वो अब वहां किसी कीमत पर नहीं रहे सकती थीं कोई कीमत बची ही नहीं थी।
पर जाने से पहले उसने सोचा अपनी बहन को उसके पति की सच्चाई बता कर जाएगी नतीजा क्या निकला बहन और दूर जा खड़ी हुई वो भी अपनी बहन की बात पर यकीन तो करती थीं पर अपना घर तोड़ने की हिम्मत नहीं रखती थी ।

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और सब में ये हिम्मत होती भी कहाँ हैं , ये दुनिया हैं यहां हर तरह के लोग रहते हैं किसी को क्या अच्छा और बुरा कहना । इस दुनिया में जो जैसा भी बना है किसी वजह से बना है या किसी की वज़ह से बना हैं ।

18 साल की उम्र और क्या क्या झेलना बाकी था दुनिया का तो पता नहीं पर मुझे जीजा से ये उम्मीद नहीं थीं , उसने कहा।

जिस इंसान को वो जानती थीं वो ये था ही नहीं या शायद उसने पहचानने में ही भूल कर दी ।
क्या दुनियां के सारे मर्द एक जैसे होते हैं नहीं ऐसा होगा तो अंबेडकर जी कहां जाएंगे ।

हा.. हा हा ….. एक जोर की हसीं के साथ आँखें गीली हों गई । पता नहीं किस बात पर हसीं अपनी जिंदगी पर या बेकार से मजाक पर। और चल दी एक लंबे सफर पर अपने दोनों बच्चों को लिए एक लंबी सड़क पर चलते चलते सूरज ढलना शुरू हो गया मगर ये सफ़र और ये सड़क खत्म नहीं हुई ।

वो सड़क खत्म तो ना हुई पर एक चौराहे पर जाकर रुक गई, अब इन आगे 3 राहों में कहा जाती कोई बस वहां आकर रुकी तो उसी मे बैठ गई बिना जानें उसे कहां जाना हैं ।

रात हों गई आख़री जगह बस रुकी तो रेलवे स्टेशन था अब क्या था उतरना तो था , रात को उसने रेलवे स्टेशन में ही पनाह ली इससे ज्यादा बेबस उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था वो अपने बच्चों के सिर पर एक छत नहीं दे सकी ।

सुबह हों गई उसके पास इतने पैसे थे कि वो एक टिकट लें सके पर बच्चे चाय मांग रहे थे बस वो टिकट काउंटर को और चाय वाले को देखती रह गई ।

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पास में खंभा था कमर टिका कर उसी से बैठ गई बच्चे रो रहे थे वो तो हाथ में पैसे देख रही थीं कितनी भी बार गिने एक ही गिनती आती थी ।
अचानक हाथों में पैसों की बारिश शुरू हो गई ये दिन भी आना था खैर , चाहें कुछ भी हो अभी बच्चो का पेट भरना ज़रूरी था।

फिर बच्चो को लेकर गांव पहुंची, मां को मनाया गांव का घर बेच कर शहर में एक छोटा घर लें लिया , उसी के सामने एक पेड़ के नीचे इस्त्री की दुकान खोल ली लोगों के घर से कपड़े लेकर आना और छोड़ कर आने का काम भी खुद करती , फिर घर का काम दोनों बच्चों को पास के स्कूल में दाखिला दिलवा दिया था , दिन भर पैदल चलना और खड़े होकर इस्त्री करना, बच्चो का ध्यान भी रखना थक जाती थीं वो पर हार नहीं मान रही थीं ।
ऊपर से उस नसेड़ी का बार बार आना बच्चों का नाम लेकर परेशान करना पर पैसे दें दो तो चुप चाप चले जाना ।
आखिर 6 साल में तलाक भी हुआ पर उससे पीछा नहीं छूटा ।

जीजा का व्यवसाय भी ठप पड़ गया उनके दोनों बच्चों की जिम्मेदारी भी उसी के सर आ पड़ी वो दोनों मिया बीवि अपना नया काम बनाने में लग गए।
चार लोगों की जिम्मदारी उसके अकेले कंधों पर थीं जिसे वो बखूबी निभा रही थीं।

पर जिंदगी में कुछ ख़ाली था एक अकेलापन था जो शायद सिर्फ़ एक जीवनसाथी ही पूरी कर सकता था और दिल भी तैयार था शायद आखिर उम्र ही क्या थीं 20 साल छोटी उम्र में बहुत कुछ देखा था मगर एक जीवन साथी की तो हमें उम्र भर जरूरत रहती हैं तो उसका दिल कैसे मान जाता।

जिंदगी अब कल को भूल चुकी थीं वो आज मे जीना सीख रही थीं पर उसके लिए इतनी मेहनत करना दिन रात लगे रहना थक हार के सो जाना मां का ईलाज करवाना पड़ रहा था खर्चर बढ़ता जा रहा था ।

अकसर घर का रास्ता भूल जाती थीं , बड़ी मुश्किल से मिलती थीं , एक बार एक भला लड़का 18 साल का होगा उसकी माँ को उसके घर छोड़ने आया ।

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देखने में नौजवान काफ़ी खूबसूरत था नज़रे हटाने से न हटे मुस्कान ऐसी थीं एक दुखी मन को भी खुश कर जाएं नौजवान घर तक छोड़ने आया तो पर वो तब वहां मौजूद नहीं थी पड़ोसी से फ़ोन करवाया आवाज तो ऐसी थीं जैसे कानों में कोई शहद घोल रहा हों ।

Jindgi part 2

आपकी मां को मैं ले आया हूं please आप जल्दी आ जाए मुझे कहीं जाना है वो जल्दी जल्दी वापिस आई ।

उन दोनों ने एक दुसरे को देखा तो जैसे सावन आ गया हो , हवा रुक गई हों एक पल को वक्त थम गया हों , सारे दुनिया के फूल खिल उठे।

पर ये ज्यादा देर तक नहीं रहा उसके पास आते ही दोनों के खयाल पास खड़ी पड़ोसन ने तोड़ दिए ।

 

उसे भी कुछ याद आया और कहने लगा .. अरे आप इन्हें संभाले मुझे अपना एग्जाम देने जाना है सिर्फ 30 मिनट बचे हैं और वो यहां से 1 घंटे की दूरी पर हैं ।

जब उसने उसकी इतनी मदद की तो वो क्यों पीछे हटती सारे शॉर्ट कट काम करते करते उसे अच्छे से पता चल गए थे ।

और कभी कभी पड़ोसी की स्कूटी भी ले लेती थीं तो आज उससे भी ज्यादा क्या काम मे आता ।

 

उसने पड़ोसी का स्कूटर लिया और उसे बैठा कर जल्दी। अपने साथ ।

रास्ता पूछा और बोली सही से बैठना तेज़ रफ़्तार में उस उड़न खटोले को लेकर उड़ चली ।

उसके हाथ कन्धों पर आ रुके जैसे चांद के पास तारा आया हों और उसे बुझे हुए चांद की रौशनी वापिस आ गई उसके काले आसमां में रोशनी का समुन्दर भर गया ।

पहली मुलाकात में ही दोनों ने एक दूसरे लिए बहुत कुछ कर दिया इसलिए दिल में एक दूसरे के घर कर गए । उसने उसे स्कूल के दरवाज़े पर उतारा और वो शुक्रिया कह कर चला गया ।

नज़रे मिली थीं कुछ पलों को लफ्जों में तो कुछ न कहा पर नज़रों ने बहुत कुछ कहें दिया था एक दूसरे से ।

 

Author: Chhavi