Jindagi part 5

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खुशी अस्पताल थीं उसके बड़े बेटे का बुरी तरह एक्सिडेंट हुआ था ।
वो ना चल पा रहा था ना हिल पा रहा था ना बोल पा रहा था सिर्फ उसकी आंखे खुली थीं और वो बिस्तर पर पड़ा था । 16 साल का उसका बेटा 10 वी के इम्तिहान देकर लौट रहा था और ये दुर्घटना हो गई |

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खुशी उसके लिए बहुत परेशान थीं ऊपर से दूसरे बेटे का कुछ अता पता नहीं था वो पिछले दो दिनों से गायब था पर ये तो उसका आए दिन का काम था शराब पीकर इधर उधर जो गायब हो जाता था छोटी मोटी चोरी भी करता था 15 साल का था और उसके ऐसे थे , ये सारा संगत का असर था राज़ की वज़ह से वो शिवम पर ध्यान ही नहीं दे पाई ।
राज और खुशी इन दोनों के रिश्ते में काफ़ी दूरियां थीं जो कभी कम ही ना हों सकी ये सब बहुत पहले से ही शुरू हों गया था विश्वास के जिंदगी में आने से पहले से ही शायद विश्वास और अपनी मां के बारे में वो अच्छे जानता था और उस बच्चे के बारे में भी जो खुशी ने गिरवा दिया था , उसे अपनी मां के ऐसे काम पसंद नहीं थे , जो कुछ भी आज तक उसने किया उसकी नज़र में गलत था जिसकी वजह से उसकी अपनी मां के लिए जो नफरत थीं वो बढ़ती चली गई ।

खुशी ने अपने और राज़ के रिश्ते को सुधारने की बहुत कोशिश की पर वो हमेशा नाकाम रही , जैसे राज़ ने तय ही कर लिया था की वो अपने दिल के दरवाज़े हमेशा अपनी मां के लिए बंद रखेगा ।

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विश्वास के जिंदगी में से जानें के बाद खुशी पुरी तरह टूट गई थी उस बात को 5 साल गुजर गए थे मगर वो दिल में से जानें को तैयार नहीं था , वो खालीपन उसकी जिंदगी में दोबारा घर कर गया, वो इस बात के लिए भी पछताती थीं कि उसने दोबारा किसी पर भरोसा क्यों किया।

अपने इस खालीपन के साथ वो डिप्रेशन में जाना शुरू हों गई उसका छोटी छोटी चीजों में मन नहीं लगता था , हर वक्त रोने का मन करता, ना बच्चो पर ठीक से ध्यान दिया , लगभग 3 साल इसी प्रकार बीते उसका मन मर चुका था तो समझो वो मर चुकी थीं , क्योंकि जब किसी इंसान में इच्छाएं खत्म हो जाए सभी आशाएं , उमंगे खत्म हो जाए और पास में बस एक शरीर रह जाए तो मृत से ज्यादा कुछ नहीं होता , वो कब की मर चुकी थीं , इस दुनियां को भी छोड़ कर चली जाती पर उसके बच्चो को कौन संभालता , ये बच्चे हमेशा से उसके गले की हड्डी बनकर रहे और आज़ यही सामने ये दिन दिखा रहे थे , एक में बे इंतेहा नफ़रत भरी हुई थीं और दूसरा पूरा अपने बाप पर गया था , शराब पीना चौरी करना , घर का सामान उठा कर बेक देना यही सब शिवम के काम थें।
आए दिन सड़क पर इधर उधर पड़े रहना वो उसे सुबह को ढूंढने निकलती तो कहीं पड़ा हुआ मिल जाता तो कभी पुलिस धाने में तो कभी मिलता ही नहीं स्कूल कब का छोड़ चुका था, ये तो किस्मत की बात थीं एक लड़का स्कूल का टॉपर निकला और दूसरा अपने बाप पर ।

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दोनों से एक बार किसी ने सवाल पूछा था बेटा आप ऐसे क्यों हों , तो दोनों का एक ही जवाब था मेरे बाप को देखा हैं ।
अर्थात हम खून को दोष नहीं दे सकते, क्योंकि किसी परिस्थिति में हम कैसी प्रतिक्रिया करते हैं हम पर भी निर्भर करता है । और हम अपनी जिंदगी में जो भी बनते हैं उसमें हमसे सम्बन्धित लोगों और माहौल की बड़ी भूमिका होती हैं ।
हम अपनी जिंदगी में जो भी पराप्त करते हैं उसमें हमारी जिंदगी आए हर व्यक्ति का योगदान होता हैं चाहें वो अच्छा हों या बुरा ।

हम जो भी करते हैं या कभी न कभी किसी अनजान से भी कुछ कहते हैं तो उससे वो व्यक्ति परभावित होता हैं इसलिए हमेशा हमें किसी अंजान से भी सोच समझ कर बोलना चाहिए क्या पता इसका उस पर क्या असर पड़े ।

राज के इलाज़ में लाखों रुपए लगने थें , वो जैसे तैसे पैसे इक्ट्ठे कर रही थी कुछ पैसे राज़ के अध्यापक ने दिए थे , कुछ अपनी बहन से लेकर आई थीं , फिर भी पैसे कम पड़ रहे थे मजबूरियां जानें कहां तक ले जाती हैं , जब लहरे तेज़ हो तो कश्ती डूब जाती हैं , जब साहिल ए समुंद्र से सागर रेत को लेने आता हैं उसे जाना ही पड़ता हैं ,
ऐसे ही औलाद के आगे हर मां को झुकना ही पड़ता हैं इस वक्त उसके लिए राज़ की जिंदगी से ज्यादा ज़रूरी कुछ नहीं था इतने पैसो का इंतजाम वो इतनी जल्दी कहां से करती ये मजबूरियां उसे बाजार तक ले आई ।

एक यहीं तरीका था उसके पास राज़ की जान बचाने का और खुद से नफरत करने की एक वजह और पाने का।

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पैसे चाहें हलाल के थे या हराम के उसके बच्चे उसकी जान थें ।

शिवम 15 दिन बाद घर वापस आया , उसका कोई पता नहीं था बुरी तरह पिट कर आया था जरूर चौरी की थी वहां पकड़ा गया घर वालों ने पकड़ कर रख लिया जब कोई लेने ना आया तो छोड़ दिया आकर राज़ की ऐसी हालत देखी तो उसे बहुत दुख हुआ , शर्म भी आई इस वक्त मां अकेली थी कोई उसके साथ नहीं था ये बात उसे बार बार शर्मसार कर रही थीं । शराबी जरूर था पर पत्थर दिल नही वो अपनी मां और भाई से बहुत प्यार करता था ।

उसने तय किया था कि अब वो शराब नहीं पिएगा पर नशा कभी नहीं छूटता तो उससे भी न छूटा ।
राज़ भी कुछ दिनों में अपने पैरों पर चलने लगा उसे बताया गया कि इलाज़ के सारे पैसे मास्टर ने दिए है वरना जो जिंदगी उसकी मां ने दोबारा अपनी इज़्ज़त बेच कर उसे दी थीं वो कब की खत्म कर चुका होता।

फिर कोई रात गुजरी किताबें हाथ में लिए राज़ दरिया के किनारे बैठा था और सब से दूर जाने की तैयारी कर रहा था उधर उसकी मां शिवम को फिर सड़क पर ढूंढ़ने को निकल पड़ी ।

अब जिंदगी फिर एक नए मोड़ पर जा रही थीं कोई चिड़िया अपना घोंसला छोड़ कर जा रही थी और कुछ डालियां फिर खाली होने वाली थी ।

Author: Chhavi